वंदे मातरम् के मुद्दे पर वीर सावरकर का दृष्टिकोण और आरएसएस की उससे असहमति
वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में चर्चा हो रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। आइए यह समझने का प्रयास करें कि गीत के शुरुआती समय में वीर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का वंदे मातरम् को लेकर क्या दृष्टिकोण था और क्यों इसे एक समय “कांग्रेसी गीत” माना जाता था।
सन 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् गीत की रचना की। इसके 150 वर्ष पूरे होने पर पूरे देश में इस विषय पर बहस छिड़ गई। यह जानना आवश्यक है कि इस गीत को लेकर वीर सावरकर की क्या सोच थी और RSS इसे कांग्रेसी गीत क्यों मानता था।
वंदे मातरम् का प्रारंभिक प्रसार
शुरुआती दौर में वंदे मातरम् मुख्यतः बंगाल तक सीमित था। बाद में कई राष्ट्रवादी नेताओं ने इसे देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाया:
ग्रामोफोन रिकॉर्ड और जन-स्वीकृति
ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स के माध्यम से वंदे मातरम् जन-जन तक पहुँचा। नारायण चंद्र मुखर्जी, सत्यभूषण गुप्ता और आर.एन. मुखर्जी की आवाज़ में रिकॉर्ड किए गए संस्करणों ने इसे देश-विदेश में लोकप्रिय बनाया।
वीर सावरकर और वंदे मातरम्
1906 में वीर विनायक दामोदर सावरकर लंदन पहुँचे। उन्होंने इंडियन हाउस में वंदे मातरम् को केंद्रीय स्थान दिया। इसे प्रार्थनाओं, अभिवादन और राष्ट्रीय आयोजनों का हिस्सा बनाया। हर कार्यक्रम का मंगलाचरण वंदे मातरम् से होता था।
1908 में 1857 की क्रांति की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों में सावरकर के नेतृत्व में वंदे मातरम् का गायन हुआ। मदनलाल ढींगरा, हरनाम सिंह, रफीक अहमद खान और ज्ञानचंद वर्मा जैसे क्रांतिकारी इसमें शामिल थे। विशेष वंदे मातरम् बैज भी बनाए गए।
ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की पुस्तक The Indian War of Independence – 1857 और वंदे मातरम् पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद गीत और विचारों का प्रसार जारी रहा।
सावरकर का वैचारिक दृष्टिकोण
सावरकर वंदे मातरम् को पूर्ण रूप से राष्ट्रीय गीत मानते थे। उनकी पुस्तक Hindutva: Who is a Hindu (1923) में भी इसका उल्लेख मिलता है। उनका मानना था कि यह देशभक्ति गीत है, धार्मिक नहीं। मुस्लिम लीग द्वारा 1930 में इसके बहिष्कार के आह्वान की उन्होंने कड़ी आलोचना की।
RSS की प्रारंभिक असहमति
1925 में स्थापित RSS ने शुरुआती दौर में वंदे मातरम् को अपनी शाखाओं से दूर रखा क्योंकि वह इसे कांग्रेस से जुड़ा गीत मानती थी। संगठन अपनी कार्यशैली और वैचारिक पहचान को कांग्रेस से अलग रखना चाहता था।
बाद का दृष्टिकोण
समय के साथ RSS ने वंदे मातरम् के महत्व को स्वीकार किया, पर इसे शाखाओं में अनिवार्य नहीं बनाया। संघ ने न तो इसे अस्वीकार किया और न ही पूर्ण रूप से अपनाया।
RSS ने रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित जन-गण-मन को राष्ट्रीय गान के रूप में प्राथमिकता दी, क्योंकि उस पर कभी धार्मिक आपत्ति नहीं उठी। 2006 में संघ प्रमुख के. सुदर्शन ने कहा कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहा है, पर राष्ट्रीय गान जन-गण-मन ही है।
सरकारी निर्णय और संघ का अनुपालन
1950 में भारत सरकार ने जन-गण-मन को राष्ट्रीय गान और वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। RSS ने इस निर्णय का न केवल विरोध नहीं किया, बल्कि व्यवहार में भी इसका पालन किया। संघ द्वारा जब भी वंदे मातरम् गाया गया, केवल पहले दो छंदों का ही गायन किया गया।